दरवाज़े के पीछे

                       बहुत मज़बूत दिल की महिलाओं में आती थी वह ।  “कह सकते हैं— दिल पर पत्थर रखकर आगे बढ़ने वाली”।  आज भी बार-बार अपने इष्ट देव को याद कर रही थी ॥

   “अपने परिवार के गुनाहों की माफ़ी माँग रही थी” ।

                     सारा घर लोगों से भरा हुआ था ।  पास-पड़ोसी ,रिश्तेदार सब आ चुके थे । “बड़े से कमरे के बीच में उनके पति का पार्थिव शरीर दर्शनों के लिए रखा हुआ था” ।

       बीच- बीच में उनके मुँह की तरफ़ भी देख जाती थी ।

                   “थोड़ी देर के लिए दिल भी भर आता” ,फिर  खुद पर क़ाबू पाकर अपने इष्ट देव को याद करने लग जाती ।

     “इनको अपनी शरण में रखना ,दुबारा जन्म नहीं देना । इनकी गलतियों की माफ़ी मैं माँगती हूँ” ।

     “बार-बार हाथ जोड़कर बोल  रही थी” ।

                         अपनी पूरी ज़िंदगी के सफ़र को याद कर रही थी । सबको बताया— “इनकी वजह से ही मुझे इज़्ज़त मिली , इन्होंने मुझे सिर-माथे रखा” ।

     अपने बराबर खड़े रखा । “इसलिए बाक़ी रिश्तेदारों ने भी इज्ज़त की मेरी” । 

                      बीच-बीच में उठकर याद आते ही सामान  भी रख रही कर  थी । इनको किस-किस चीज़ की आदत थी ।

     “ उनकी ओढ़ने वाली चादर जो हर रोज़ लेते थे, वह तो इनके साथ जानी ही चाहिए” ।

         फिर से उठकर कमरे में गई और दरवाज़े के पीछे खूँटी से उनके कपड़े भी उतार लायी ।

                        सबसे अच्छी और समझदारी की एक बात लगी मुझे,  “जब उन्होंने रोते हुए  को ख़ुद चुप करवा दिया” ।  दूर से ही ज़ोर से आवाज़ लगाकर बोली —

   इनको चुप करवाओगे ।

                  “ मैं नहीं चाहती कि मेरे पति रोते हुए घर से आख़िरी यात्रा के लिए जाये” ।  सब  मेरे साथ खड़े होकर भगवान का नाम लो । 

        “कृपया उनके अगले जीवन के लिए प्रार्थना करें “।   

                     “शायद बहुत मज़बूत दिल करना पड़ा होगा उनको” । या फिर  उनके इष्ट देव ने अंदरूनी हिम्मत दे दी होगी ।    

                         “जो विपत्ति में भी मज़बूत दीवार के जैसे बच्चों के साथ खड़ी हो गयी” । उनको भी संभाल रही थी और रिश्तेदारों को भी । 

       “ज्यों ही पार्थिव शरीर को लेकर  चलने लगे , लास्ट वाले दरवाज़े तक साथ गई” ।

         “ऊपर हाथ हिलाकर अलविदा कहा और उनको जाते हुए को प्यार से देखती रही” । 

                        कुछ समझदार लोग भी थे वहाँ । “उन्होंने सबसे कहा —जैसे यह करना चाहती हैं करने दो , रोकना नहीं” । 

                     नहीं तो इनके मन में रह जाएगा कि— “आख़िरी समय यह भी नहीं कर पाई , या गलती से यह  हो गया” ।

        दाह-संस्कार होते  सबको चाय-पानी दिलवाया । “ख़ुद भी ली ,जैसी चाय वह लेती है वैसे ही बनवा कर” ।

                    परिवार के बाक़ी लोगों को सलाह दी कि सबको खाना दो । सब लोग दूर-दूर से आए हैं ।  “किसी को ख़ाली पेट नहीं जाने देना” ।

                       घर की मज़बूत दीवार जैसे बनकर सब संभाल रही थी ।  आने वालों से भी मिल रही थी । “लेकिन बीच-बीच में उठकर कमरे से बाहर भी चली जाती थी” । 

        फिर दो- तीन मिनट में वापस आकर सब के बीच बैठ जाती ।

                 “अबकी बार ज्यों ही वह उठी ,  मैं उनके पीछे-पीछे गई” । बस ऐसे ही उनको सँभालने । 

        “दरवाज़े के पीछे से सिसकियों की आवाज़ ने मेरी आंखें भी गीली कर दी” ।

                      अपना दुख-दर्द  “दरवाज़े के पीछे”  बहाकर आ गई थी । और फिर सबके साथ बैठ गई  ।  यह सब देख कर उनके लिए श्रद्धाभाव और भी बढ़ गया ।

                        धीरे - धीरे सब पड़ोसी और रिश्तेदार एक-एक कर के चले गए । बस थोडे-बहुत रिश्तेदार ही रह गए  जिन्होंने यहाँ  रुकना था ।

         “और अब वह भी सब के बीच से उठकर अपनी संध्याकाल पूजा के लिए अपने कमरे में जा चुकी थी” ॥

    


Comments

  1. Excellent real one

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  2. Excellent real one

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  3. Well explained ma’am

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  4. Looking some one your known related to the story
    Nice discription

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  5. Emotional attachment tarnishes gradually, well responsibility supersedes emotions. Well description by Manju.

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