त्योहार तो हमारा भी है
कैलाश को बहुत दिनों से इंतज़ार था इस दिन का । “नया साल शुरू होते ही , दिन गिनने शुरू कर दिए थे” ।
धर्मशाला में कहाँ पर बैठना , यह भी पहले ही सोच रखा था ।
“हर-रोज़ एक चक्कर , उस गली में पक्का लगाकर ही आता था” ।आने-जाने का रास्ता वहीं बना दिया था ।
कैलाश का इंतज़ार आज ख़त्म हो गया । “सुबह होने की बेसब्री साफ़-साफ़ दिखाई दे रही थी” । आँखें खुलते ही नहा धोकर तैयार हो गया ।
“मीना के उठने से पहले ही अपने बेटे रोहित को भी उठा लिया” ।
उसको भी नहला कर तैयार कर लिया । जैसे ही मीना की आँखें खुली उसको बोला—हम जा रहे हैं ।
“तुम बाद में आना , जब भीड़ छँट जाएं” ।
कैलाश ने बहुत सारा इंतज़ाम कर रखा था इस दिन के लिए ।
“एक जगह नहीं तो , दूसरी भी सोच रखी थी । ख़ाली तो नहीं जाने देता कोई भी” ।
मकर संक्रांति पर हर कोई दान करता ही है ।
हमारा भी आज काफ़ी इकट्ठा हो ही जाएगा । सोचते हुए नयी बन रही धर्मशाला की तरफ़ चल दिया ।
साथ में रोहित का हाथ भी पकड़ा हुआ था ।
“छोटे बच्चों को देखकर लोग ज़्यादा दे देते हैं” ।
अपनी तय की हुई जगह पर बैठ गया जाकर । “दिखाना शुरू कर दिया जैसे बहुत ही ज़रूरतमंद है” ।
“रोहित को तो बेचारा बच्चा , दिखाकर बिठा दिया था” ।
एक के बाद एक गाड़ी रुक रही थी । कुछ पैदल भी आ रहे थे । उनको देखकर ही आँखें चमक रही थी ।
और उम्मीद तो सातवें आसमान पर थी ।
“रोहित इतना छोटा भी नहीं था कि समझ ना सके कि यहाँ क्यों बिठा रखा है” । नहीं चाहता था यह सब करना ।
“लेकिन पापा से डरता था । इसीलिए चुपचाप बैठा रहा” ।
देखते-देखते तीन-चार घंटों में ही कैलाश रोहित के आगे कपड़ों और खाने का ढेर लगने लगा ।
जब भी कोई कुछ देता उसके जाते ही कैलाश , उठाकर अपने पीछे रख लेता । “ताकि दूसरे दानी को लगे कि इसको तो अभी तक कुछ मिला ही नहीं” ।
संतुष्ट भी था आज । “इतना जो मिल रहा था” ।
सारा सामान समेटकर बेटे को लेकर घर की तरफ़ चल दिया ।
जाते-जाते सोचने लगा कि मकर संक्रांति का त्योहार तो उनका भी है । “उसको भी तो दान करना था आज” ।
कुछ तो देगा ही । घर जाकर सारा सामान देखा । “जो उसको मतलब का नहीं लगा उसको एक बैग में डाल लिया” ।
गली के छोटे मंदिर के आगे जाकर खड़ा हो गया ।
“अब दान करने की बारी उसकी थी” ।
जो भी आता गया ,उनको देता गया । बैठे हुए लाचार लोगों को भी दिया । “अपना फ़र्ज़ पूरा किया ,जो सामान लाया था सब बाँट दिया” ।
हंसते हुए चल रहा था । “आज का दिन तो बहुत ही अच्छा गया” ।
अगर उसने दान लिया है तो वो देने से भी पीछे नहीं हटा । “मीना को घर आते ही बोला— कुछ अच्छा खाने का बना लो” ।
हम भी अपनी मकर संक्रांति मना लेते हैं ।
आख़िर “त्योहार तो हमारा भी है” ॥
Well written
ReplyDeleteNo words ma'am
ReplyDeleteIts amazing
Bhut acha likhti hai aap
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