कथा का असली अर्थ

                    उनको तो  पता ही नहीं था । किसने  यह सब व्यवस्था की थी धार्मिक कथा ज्ञान की” । बस एक बड़ा सा पंडाल लगते  हुए देख लिया था । 

     सबके लिए बैठने का बंदोबस्त भी बढ़िया किया गया  था । 

     “कोई भी आ सकता था” । किसी को भी अंदर जाने से नहीं रोक रहे थे ।

    “जो जानता भी नहीं उसको भी आदर सम्मान से बिठा रहे थे” । 

                          “ उसमें कुछ तो अपना समय व्यतीत करने आये थे । जो सोच रहे थे कि  घर बैठकर दिवार ही तो देखनी है” ।

     अच्छा है थोड़ा रौनक में बैठकर जाएंगे ।

                   “एक-आधा  संगत में ऐसा भी था जिनको  बस पता चलना चाहिए कि धार्मिक प्रोग्राम कहाँ हो रहा है”। और कौन कर रहा है । 

       उन्हें तो जाना ही है ,”फिर वह किसी भी धर्म या पंथ से क्यों न हो” ।

                   और फिर उसी भीड़ में एक परिवार ऐसा भी था । “जिसको न कथा-वाचक से कुछ लेना था” । ना ही उस आयोजक परिवार को जानते थे 

                    “ना ही उनकी इस समय धार्मिक प्रवचन में कोई रुचि थी”। बार-बार गर्दन इधर-उधर मोड़कर आते-जाते लोगों को देखे जा रहे थे  । 

     “शायद कोई आना होगा उनका अपना, जिसका इंतज़ार कर रहे थे” ।

                       धीरे-धीरे पूरा पंडाल भर गया । “क़रीब एक घंटा कथावाचक ने गीता पाठ  किया” । उसके बाद कथा-वाचक जी ने आरती के  लिए खड़े होने को बोल दिया । 

                 “पूरा परिवार धीरे धीरे निकलकर सबसे लास्ट में गेट के पास खड़ा हो गया” । ताकि सबसे पहले बाहर जा सके ।  

  “भगवान का स्मरण  तो आस-पास भी नहीं था”।

     ना ही गीता पाठ  की तरफ़ कोई ध्यान था ।

                   “लेकिन उनको आरती की घंटी बड़े ध्यान से सुन रही थी” ।क्योंकि उसके ख़त्म होते ही सबको बाहर जाने को बोलने वाले थे । 

                       “ज्यों ही कथा वाचक खड़े हुए वह भी समझ गये कि पक्का अब समापन होने वाला है , तभी लाइन बनानी शुरू कर दी” । 

                 “इतनी भीड़ में मेरा ध्यान उस परिवार पर ही जा रहा था । शायद ही वहाँ कोई इतना  बेचैन होगा” ।

   “मैं भी उस दिन कथा में पूरा ध्यान नहीं लगा पाई” ।

      उनके चेहरे के हावभाव व बेचैनी मुझे महसूस हो रही थी ।        

                        “जैसे उनका मक़सद इस कथा या परिवार से नहीं बल्कि कुछ और ही था” । बाहर चलने का आदेश मिलते सबसे पहले निकल गये ।

    “बाहर निकलते ही समझ आ गई उनकी बेचैनी”।  

                 वह सब तो प्रसाद के इंतज़ार में थे । सबने प्लेटें भरवा कर आराम से बैठ कर खाया । 

   “लेकिन सबको एक ही बार मिला , शायद उनको यह पहले ही पता  था” । 

                         प्रसाद खाकर सब अब चैन से बैठे हुए थे । अब बैचेनी नहीं बल्कि संतुष्टि थी उनके चेहरों पर ।  

                     “अब उनको अंदर सजा हुआ पंडाल और भगवान की मूर्ति सब  दिखाई दे रहा था” ।  उनको तो अब उस परिवार को देखने की उत्सुकता भी थी “जिन्होंने यह सब व्यवस्था की”  ।

       कथावाचक को भी  देखकर आना चाहते थे । जिनको सुनने के लिए इतने लोग इकट्ठा हुए थे ।

                  पूरा परिवार  संतुष्ट होकर भगवान की मूर्ति को निहार रहा था । “शायद  पेट भरने के बाद ही भगवान याद आये उनको” ।

   “इनके लिए तो  भगवान का स्मरण  अब शुरू हुआ है” ।

                   लेकिन मैं उनको ऐसे संतुष्ट , प्रसन्न देखकर वाक़ई खुश थी ।  “पूरे दो घंटे से यह लोग बेचैन से इधर-उधर देख रहे थे”।

  “अपना पेट भरने के लिए कथा समाप्त होने के इंतज़ार में” ।

                   “कथा का असली अर्थ” तो आज पूरा हुआ था ,इस आयोजक परिवार के लिए । 

     “जहाँ एक भूखा परिवार संतुष्ट और प्रसन्न होकर जा रहा था” ।  सबको आशीर्वाद देते हुए ॥

     


Comments

  1. Well explained ma’am

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  2. We should help for needed
    Well written

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  3. True,
    Everyone has different significance for a single event

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  4. Have been characterised very minutely.

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