एक अरसे बाद
अलग ही अनुभव था आज , बहुत सालों बाद रेलवे स्टेशन पर जाना । “एक बार तो ऐसा लगा जैसे ऐसी जगह तो मैं कभी आयी ही नहीं” ।
“मुझे एक ही रेलवे स्टेशन याद था , वह भी मेरे बचपन वाला” ।
छोटी सी जगह पर टिकट का कमरा और इंतज़ार करने वालों के लिए खुली जगह । “और एक छोटा सा प्याऊ” ।
प्याऊ समझ रहे होंगे आप ?
“वही जो मटके को गिली बोरी से ढककर उसको ठंडा रखते हैं” । उसी के साथ लुटिया बाँधकर रखी होती है ताकि कोई उसको में साथ न ले जाएं ।
“पता नहीं आजकल कहीं है या नहीं” ।
रेलवे स्टेशन के दोनों तरफ़ खुला कच्चा रास्ता । “बहुत दूर जाकर कहीं पककी सड़क थी” ।
आज तो एक नए अवतार का रेलवे स्टेशन देखने को मिल रहा था ।
“एक साथ इतनी सारी रेलगाड़ी ,अलग-अलग लाइन पर और इतने ही प्लेटफ़ार्म” । सभी शहरों के लिए अलग रूट वाली ट्रेन ।
ज्यों ही ट्रेन रुकी सब एक साथ भागने लगे , ट्रेन छूटने के डर से । “हम भी उन में से एक थे” ।
पता ही नहीं था कि ट्रेन हमें लिए बिना नहीं जाएगी । “ट्रेन के समय की सूचना पहले ही फ़ोन पर आयी हुई थी” ।
और तो और सीट नंबर भी फिक्स था । जैसे बस और जहाज़ में होता है । “तो हमें भागने की ज़रूरत तो नहीं थी”।
“लेकिन वही बचपन वाली आदत । जल्दी चढ़ो नहीं तो ट्रेन चल पड़ेगी” ।
बहुत सारे लोग सामान रखकर आराम से बैठे हुए थे टेंशन फ़्री । “कुछ तो सुस्ता भी रहे थे । लेटे हुए थे सामान के साथ ही । शायद काफ़ी देर से बैठे होंगे” ।
तभी मेरा ध्यान तेज़ी से आ रहे रिक्शा चालक पर गया ।
लाल शर्ट पहनें हुए बड़ी तेज़ी से हाथ से ही खींचता हुआ आ रहा था । “लोगों को बचना पड़ रहा था ,सामान सरका-सरकाकर” ।
लेकिन उसको तो कोई असर नहीं था”।
हर रोज़ आने-जाने वाला लग रहा था । शायद तभी हक़ से निकल रहा था । “थोड़ी देर बाद देखा ,रिक्शे को सामान से भरकर वापिस चल दिया” ।
उसके साथ ट्रेन से उतरने वाले लोग भी थे । “तभी पता चला यह तो कुली है” ।
यात्रियों का सामान ढोने वाला । “उसका तो यह अपना ही प्लेटफ़ार्म था तभी तो बिना परवाह किये आराम से चल रहा था” ।
“ लेकिन यह क्या हमारे ट्रेन में चढ़ते ही दरवाज़ा बंद हो गया ।
“एक-दूसरे को देख कर हंसी भी छूट गई” ।क्योंकि हम ट्रेन के अंदर ही रूक गए थे” ।
गाड़ी में सफ़ाई का काम शुरू कर दिया गया । सबको नीचे उतरने को बोला था । लेकिन अन्दर गए तो सीटों पर ही विराजमान हो गए थे ।
“ तो अब उठने का मतलब ही नहीं” ।
तभी पता चल ट्रेन भी 20 मिनट लेट चलेगी । “जिनको छोड़ने गए थे हम अभी भी उनके साथ ही ट्रेन में क़ैद हो गये थे ” ।
ज्यों ही दरवाज़ा खुला हम उनसे मिलकर नीचे उतर आए ।
जहाँ कार को खड़ा किया उधर ही चल दिए ।
“लेकिन मन में बचपन वाली फ़िल्म चल पड़ी थी । पापड़ वाला भी आ गया” ।
“बँटा शिकंजी बेचने वाले भी खड़े थे” । चिप्स के लटकते हुए पैकिट भी टंगे हुए थे ।
लेकिन अब मैं बचपन के जैसे भाग-भागकर नहीं चल रही थी ।
“आराम से, भीड़ से बच-बचकर निकल रही थी” । आज “एक अरसे बाद” बचपन की यादें ज़िंदा हो गई ।
“बच्चों के जैसे ट्रेन को हाथ लगाते-लगाते चलना चाहती थी” ।
“हँसी का पात्र ना बन जाऊँ यह सोचकर रूक गई” ।
“आज ट्रेन ने मेरे बचपन की याद जैसे छुकछुक भी नहीं किया” ।
चुपचाप पटरी पर धीरे- धीरे चलकर बिना शोर किए आँखों से ओझल होती चली गई ॥
👌👌sweet memories of childhood
ReplyDeleteDil ko chuu gyi ye khani
ReplyDeleteWell written
Excellent work Ma’am
ReplyDeleteBest explanation of childhood memories, virtual characters have been characterised in a realistic manner, she is advised to hold up inspiration.
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