उनकी पुरानी और हमारी नई

                        आज पूरे मोहल्ले के  बच्चों को अपने आंगन में इकट्ठा किया हुआ था समर ने । कल ही सबकों खेलते समय बोल दिया था ।

   “ कल  शाम के 5 बजे सब आ जाना मेरे घर पर” ।

                     अपनी माँ को भी काम पर लगा रखा था । “उठकर जाने की कोशिश करती तो भाग कर चिपक जाता  ।

    “ माँ -माँ थोड़ी देर और करवा दो ना” ।

        अब  सभी किताबों को सामने वाली मेज़ पर जँचा रहा था । “अपने दोस्तों को जो दिखानी थी” ।

                      उनपर साफ़-सुथरे अख़बार भी चढ़ा दिए थे । “अपना नाम , स्कूल का नाम , साल व विषय सब लिख दिया थ ।  

   “ वह भी मोटे पेन के साथ,जो दूर से ही दिखाई दे रहा था”। 

       और बच्चे भी पूरे उत्साह से देख रहे थे । नई क्लास की नई  किताबें ।

                        तभी पड़ोस वाली चाची ने हँसकर कहा —“शादी जैसा माहौल बना दिया समर  ने तो” । एक दिन क़ामयाब होकर बड़ा अफ़सर  पक्का बन जाएगा ।

    और समर  ने भी उसी समय उनको उत्तर दिया — “नहीं-नहीं चाची जी । बहुत बड़ा व्यापारी बनूँगा मैं तो” ।

   सभी बच्चों ने शोर मचाना शुरू कर दिया । 

   “बता तो दो । कहाँ से लाया है ?  हमारे स्कूल में तो अभी तक नही आयी” ।

                 सरकार भी अगले महीने तक ही दिलवा सकती है । “समर ने अपनी शर्ट का कॉलर ऊपर उठाकर कहा —वह बड़ी सोसाइटी का गार्ड है ना ,वह मेरा यार बन गया है” ।

    उसी ने बताया सब के बच्चे अगली क्लास में होनेवाले है ।        

                     “लोगों ने  पुरानी किताबें छाँटकर दान करने के लिए सोसाइटी के सहायता कक्ष में भेजनी शुरू कर दी है” ।

बहुत नई-नई किताबे हैं । 

                      लगता ही नहीं कि पूरा साल पढ़ने के बाद ही निकाली है । “अब लोगों को ज़रूरतमंद बच्चों को देने के लिए दान करनी है ” ।

      “उनके लिये यह तो रद्दी ही है” । 

                 “ मुझे गार्ड ने क्लास पूछ कर वहाँ रखी किताबें दिलवा दी” । काफ़ी  कॉपियां भी थी । जिनमें में सब कुछ वृतांत  से लिखा हुआ था ।

        तभी समर के दोस्त ने बोला —वह जो ज़्यादातर सबको अंदर जाने से रोकता रहता है ।

    “वही बड़े गेट वाला गार्ड क्या” ?  

  हाँ हाँ वही - समर मुस्कुरा कर बोला ।

    समर का यह दोस्त सब को रोकता-टोकता रहता था ।

                     तभी वह ताली बजा कर ज़ोर से हँसा —“अरे यह तो पुरानी है । रद्दी में पड़ी किताबें लेकर ख़ुश हो गया यह तो” । 

       तो क्या हुआ ---समर ने  बहुत शांत स्वभाव से सोचकर जवाब दिया । 

        “उनके लिए रद्दी होगी  क्योंकि उनका काम पूरा हो गया” ।

                   “ मेरे लिए तो शुरुआत है” । अगले साल ख़त्म होने तक रहेगी । नई जैसी ही है । अंदर लिखा हुआ देखना है जो एक दम नया है ।

  हाँ हाँ ठीक है तुम्हारी बात भी ।

                “वैसे तो पुरानी ही है पर मेरे लिए तो नई  है ना । नई क्लास नया विषय नई किताबें” ।

                    “तुम लोग चाहो तो तुम्हें भी दिलवा सकता हूँ” । एक महीना ख़राब नहीं जाएगा तुम्हारा भी ।

 तभी ज़्यादातर दोस्त एक आवाज़ में बोले —हाँ “-हाँ हमें भी चाहिए ।

   “उनके साथ ही समर का दोस्त भी मुह बनाते हुए बोलने लगा —हाँ-हाँ मुझे भी”।

                        सब बच्चों ने मिलकर समर को कंधों पर उठा लिया । और एक-साथ चिल्ला कर बोले—  “उनकी पुरानी और हमारी नई” ॥


Comments

  1. Bhut shi topic has been selected
    Very well written

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  2. Well description, Samer understands his economical conditions.

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  3. Beautifully explained with gold moral well done ma’am

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  4. Gold moral for our society

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