आख़िरी मुलाक़ात

                          काफ़ी समय से नहीं बल्कि  8/9 महीने से “उन शांत से स्वभाव वाले अंकल को नहीं देखा था” । 

                 वैसे उनके बारे में इतना जानती भी नहीं थी । “फिर भी उनके साथ अपनापन-सा महसूस होता था”।

     बस बहुत बार घूमते-फिरते मिल जाते थे । अक्सर पार्क में , बैंच पर बैठे हुए देखती थी उनको ।

                       कई बार राशन -सब्ज़ी लेकर आते हुए भी मिलते ।  “मिलते थे हमेशा मुस्कुराकर ही और  कभी-कभी सिर पर हाथ रखकर  जाते “।

                        याद है हमें एक बार की बात । हम किसी सत्संग  से वापिस आ रहे थे । तभी रास्ते में अंकल मिले । हमने कहा — लो अंकल  प्रसाद ले लो ।

     “उन्होंने बड़ी-सी मुस्कुराहट दी और हाथ आगे कर दिया दोनों हाथों से प्रसाद स्वीकार किया” ।

                       फिर सिर पर हाथ रखकर बोले —“ख़ुश रखो , शायद इस प्रसाद में मेरा भी हिस्सा था” । फिर खाते हुए घर की तरफ़ चले गए ।

                      अभी पिछले हफ़्ते ही पड़ोसियों में चर्चा चल रही थी कि पड़ोस में किसी की मौत हो गई । “ दाह-संस्कार भी हो चुका है” ।

    “लेकिन गली में किसी को भी नहीं पता चला”।

     “गाड़ियां तो खड़ी देखी हमने भी बहुत सारी,  लेकिन वजह तो नहीं पता थी कि क्या हुआ है” ।

                          सब लगभग ख़फ़ा थे कि पड़ोस में बताया ही नहीं । “एक-  दो दिन बातें चलकर  बंद हो गई जैसे कुछ हुआ ही नहीं” ।

     आज सुबह उठते ही फ़ोन में  आया मैसेज देखा किया किसी की क्रिया का था ।

    “अंतिम अरदास का समय और जगह बतायी हुई थी” ।

                     लेकिन उसको देखकर दिमाग़ में जैसे बैचेनी सी हो गई । “तभी पूरा खोल कर देखा ,तो एक दम स्तब्ध हो गई थी मैं” ।

      “अरे ! यह तो वही अंकल है” । जो हमेशा सैर करते हुए मिलते थे ।

                         उनके लिए परिवार ने अंतिम अरदास रखी थी । “पढ़ते  ही मन निराश हो गया कि हम उनकी आख़िरी यात्रा में भी नहीं जा सके” ।

      रिश्तेदार या कोई नज़दीकी नहीं थे हमारे । “लेकिन  “स्वर्गीय” लिखा देखकर  बहुत ही दुख हुआ” ।

                       “ उसी समय  शोक प्रकट करने के लिए जाने का मन बना लिया” ।  नहीं तो हमेशा मन में रहेगा कि हम उनके लिए एक घंटे का समय भी नहीं दे पाए ।

      वहीं अंकल जो हमें बहुत सारे आशीर्वाद देकर जाते थे । 

     “अब कभी भी घूमते-फिरते नहीं मिलेंगे” ।

                          वहाँ पहुँचते ही हमने पूछा उनके बच्चों से भी मिलवा दो । “तभी उनके भतीजे की बहू ने बताया —कि चाचा जी ने तो शादी ही नहीं की थी” ।

  वह हमेशा से हमारे साथ ही रहते थे । 

                         तभी उन्होंने स्वयं ही बताया—“ कि चाचा जी तीन-चार बार बाथरूम में फिसलकर गिर गए थे , इसके बाद उनकी तबियत ठीक नहीं हो पाई” ।

                धीरे-धीरे बदतर ही हो गई । अचानक एक दिन बहुत उठाने से भी नहीं उठे । 

       “तब डॉक्टर ने बताया कि वह अब इस दुनिया में नहीं रहें” ।

                        आठ नौ महीने पहले जब वह मुझे आख़िरी बार मिले थे तब उन्होंने मुझे स्पेशल रोक कर बोला — आप हमेशा मुझे प्रसाद देते हो । “ रुककर  अभिवादन करके जाते हो” ।

      “और बेटा मुझे आपसे बात करना भी बहुत अच्छा लगता है”।   

      “बेटा एक बार इधर आओगे ? मैं भी छोटे बच्चे के जैसे उनकी तरफ़ भाग चलीं”।

                             आज आपको बहुत सारे आशीर्वाद देता हूँ । “और उन्होंने सिर पर हाथ रखकर इतना अपनापन दिखाया । और ढेरों आशीर्वाद दिए” । 

                          आज यहाँ बैठने के बाद  वह दृश्य मेरी आँखों के आगे घूम रहा था । “जब मैं उनसे आख़िरी बार मिली  थी” ।

                          उस बड़े से कमरे  के बीचों-बीच  उनकी फ़ोटो को फूलों से सजाया हुआ था और   सब फूल अर्पित कर रहे थे। 

       “मैं भी  उनकी फ़ोटो के सामने बैठकर  उनके नये जहाँ  के लिए भगवान से प्रार्थना कर रही थी”। 

                        उसके बाद उनके परिवार से मिलकर चलने के बाद भी मैं मुड़-मुड़कर उनकी तस्वीर को ही देख रही थी ।

       “आँखें अपने आप ही नम  होती जा रही थी और भगवान से प्रार्थना भी कर रही थी” ।

   “ लेकिन तस्वीर से ही सही आज उनसे “आख़िरी मुलाक़ात”  थी”  ॥


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