घर के दरवाज़े
आज उसको घर के दरवाज़े बंद करते हुए देखा जो ज़्यादातर खुले पड़े रहते थे । वैसे तो साल-भर मिलते रहते हैं ।
“लेकिन कल वाली “सोनी” को देखा तो लग ही नहीं रहा था कि वह पहली वाली ही है” ।
ऐसा लगा कि उसको कभी समझ ही नही पाये ।
“दिल करता उसका तो , अच्छे से बोल लेती नहीं तो मुँह फेरकर निकल जाती थी” । अभी तो धीरे-धीरे उसके रहन-सहन का पता चल रहा था ।
चुलबुली सी भी है तो कभी बिल्कुल चुप -चाप रहने वाली ।
कभी कभार ऐसे लगता “जैसे बहुत कुछ गंवाकर बैठी है अपनी ज़िंदगी में” ।
“ एक बार महसूस हुआ जैसे कि इससे दुःखी तो शायद ही कोई हो” । यह सोचकर कर हमारे जैसे ही कई लोगों ने इससे बात भी की होगी ।
क्या हुआ ? कोई मदद हो तो बताना ।
“वैसे भी मियाँ-बीबी की अनबन अब गली में आ चुकी थी” ।
अब तो यह मुद्दा बन गया था ,ज़्यादातर की बातचीत का । कुछ सहानुभूति से तो , कुछ समय व्यतीत करने
के लिए फ़ोन करके हालचाल पूछते रहते थे ।
“ बहुत मजाक बनाया लोगों ने उसकी घरेलू ज़िंदगी का” ।
लेकिन स्वभाव से तो अब भी बचपना झलकता है ।
“पहले तो कभी-कभी अपने घर परिवार का ही नहीं ,अपने घर की हवा का रुख़ ही बता देती थी”। और बोलती—अरे हो सकता है घर के दरवाज़े खुले हो ।
“शायद इसलिए हमारी आवाज़ सुनाई दी होगी” ।
बेझिझक अपने घर परिवार का सब बताती रहती थी ।
वैसे तो बेबाक़ रही हमेशा से । “कूद-फाँद करना , खुलकर हँसना उसके स्वभाव में मिक्स था पहले की तरह ही” ।
जैसे सोचकर निकलती है जितने भी समय दोस्तों के साथ रहूँ । “उन पलों को पोटली बना के रख लूँ” ।
वो सब करूँ जो मैं करना चाहती हूँ ।
“घर का माहौल तो हमेशा की तरह क्या पता ऐसे ही चलता रहे” ।
जँच रही हूँ ना बिलकुल मॉडल के जैसे — ज़रा पीछे से बाल ठीक करना । ख़ुद भी पल्ला वग़ैरह सेट करती ही रहती ।
“लेकिन एक बात ज़रूर है ,अब वह घर के दरवाज़े ढकने लग गई” ।
“और अब उसने अपना दुख-दर्द साँझा करना भी बंद कर दिया” ।
कितने ही समय साथ रहती । हसती ,बोलती और “कुछ भी पूछने से नपा-तुला जवाब देकर बात ही बदल देती है” ।
“ बात संभालने का हुनर ही सीख लिया” । या यूँ कह सकते हैं समय ने बदल दिया ।
“लेकिन पहले दुःखी, नाख़ुश रहेंगी वाली यह बदली हुई सोनी” अब “घर के दरवाज़े “ ढकना सीख गयी ॥
Good discription 👍
ReplyDelete👌👌
ReplyDeleteReal & practical life expression, time is the best healer that makes the sufferer bear his suffering.
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