अगला मेला

                         अबकी बार ,  इस साल तो मेले ही मेले मिले जाने को । एक दीवाली के बाद शुरू हुआ तो उसके ख़त्म होते दूसरा शुरू । 

  “किसी शादी समारोह से कम नहीं थे । कोई सरस मेला तो कोई जयंती मेला” ।

                     मेले में जाने वाले जितने उत्साहित थे,वहाँ बैठे दुकानदार उनसे भी ज़्यादा ।  “मजाल कोई उनकी दुकान के आगे से बिना रुके निकल जाए”। 

     दूर से ही ग्राहक की आँखों के देखने के तरीक़े से ही पहचान लेते हैं कि किस सम्मान पर नज़र टिकी है ।

                        “बीच-बीच में जड़ी-बूटी वाले बैठे हुए थे । जो अपने आपको जंगलों से आदिवासी समुदाय के बता रहे थे “।

      सबको ऊपर से नीचे जाँचते हैं । फिर नब्ज़ पकड़ कर बताते हैं ग्राहक की । 

                      “इतने शोर-शराबे में भी अपने सामान को आगे बढ़ चढ़कर बेचना आसान काम तो नहीं है”। यह भी एक कला है ।

  वह इनका तो हर रोज़ का यही काम है ।  

    आज यहाँ तो अगले सप्ताह दूसरे शहर में । 

                   ज्यों ही हम उन आदिवासी वैध  के आगे से निकले ।  “तभी  उन्होंने एक महिला को ऐसे रोका जैसे कि बहुत पहले से जानते हो” ।  

   बहन जी — जरा दिखाओ । 

         “ आपकी आँखों के नीचे सुजा-सुजा क्या है । हमारे पास इलाज है इसका  एक मिनट रुको” ।.

     “ वह महिला भी चौंक गई सुनकर   अरे - यह तो मुझे ही बुला रहे हैं” । 

                  धन्यवाद किया और बिना रुके चली गयी आगे वाली दुकान में । “तभी कुछ नाचते-गाते ढोल के साथ कुछ लोग बीन बजाते हुए भी आ गए” ।  

   देखते देखते वहाँ खड़े लोग झूमने लगे । 

                  “लोगों में शामिल होकर  ही बीन बजाकर ऐसा शमा बाँधा कि हम तो भूल ही गए कि कौन सी लाइन देख रहे थे “। 

          उनके ख़त्म होते लगा कि देर हो रही है । तभी खाने वाली दुकान की तरफ़ चल पडे ।   

   जब इतनी दूर आये है तो खाना ही चाहिए । 

                      “हालाँकि पता है कि साफ़-सुथरा ताज़ा कुछ भी नहीं है । तेल भी उबल-उबलकर  ख़राब हो गया होगा लगभग” ।

    लेकिन वही बात मेले में आये है तो खाना ही चाहिए ।

                   “खाने के बाद फिर  वही कि नही भी खाते तो  भी चल जाता”  ।  दिमाग़ में चलने लगा ।  

      “थोड़ा बहुत सामान भी ख़रीदा जिनको उठा-उठा के पूरे ग्राउंड में घूमते रहे” । 

                वहाँ पर जितने लोग थे, ज़्यादातर के दोनों हाथ सामान से भरे हुए थे  । “जब बाहर निकलते हुए कोई सामान  या  खाना लेना याद आया तो संतुष्टि ही करनी पड़ी” ।  

          चलो कोई बात नहीं । “अगली बार ,अगले साल भी देख लेंगे”।  

      लगभग दो-तीन घंटे यहाँ अच्छा समय व्यतीत हुआ । 

               अब फिर से “अगला मेला”  जो किसी भी जगह कभी भी लगा मिलेगा ।  “सकुन के कुछ पल,बहुत सारे नये-नये सामान और हमें तरोताज़ा करने के लिए” ॥


Comments

  1. Same with me en I went to see Saras mela …awesome yarrrrr it’s totally true❤️

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  2. Best time pass and to know our culture in any type of mela

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