फ़ुरसत के पल

कुछ हवा से कुछ हाथों से हटायी है 

पुरानी किताबों से आज धूल उड़ाई है 

पलटे सारे  पन्ने एक एक करके 

आठ वाया आठ का कमरा और खुली छत याद आयी है

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