बिटु की चाची

                 सामने गली में एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ को कमर पर रखें ,धीरे धीरे चलते हुए वह आ रही थी ।गली में कोई भी मिलता तो उससे हँस कर बोलती और हालचाल पूछती । पर आज वह ज़्यादा ही खिन्न नज़र आ रही थी, जैसे कोई भारी दुख आन पड़ा हो । रास्ते में ही मैंने उन्हें टोकना उचित नहीं समझा और ज़्यादा देर तक खड़े रहना शायद, उनके लिए मुमकिन नहीं था । वह लाठी को सोच-सोचकर रखती हुई अपने घर की ओर जा रही थी । थोड़ी देर बाद मैं उनके घर जा पहुँची ,वो अभी -अभी बैठे ही थी । मैंने उन्हें नमस्कार किया और उनके पास ही बैठ गई । 

           जब भी उनके पास कोई जाता तो अपनी बीती हुई ज़िंदगी की बातें सुनती थी । उन्होंने बताना शुरू किया ,जब वो यही कुछ 6 -7 साल की थी , स्कूल पढ़ने को गयी हुई थी । किसी बात पर मास्टर जी ने डांट दिया और छड़ी से पीटा भी ।तो घर आकर सब को बताया  और यही नहीं बल्कि स्कूल जाना भी छोड़ दिया । और उसके बाद कभी भी स्कूल के रास्ते नहीं गई । 

              बात बतलाते हुए वह हँसे भी जा रही थी, उन्हें बहुत ही अफ़सोस भी था कि उन्होंने पढ़ाई का सुनहरा मौक़ा छोड़ दिया । बात समाप्त करते ही उन्होंने घर के बारे में पूछा और अपने लिए रोटियां बनाने लग गई । और मेरी तरफ़ से ध्यान हटा लिया । घर तक आते आते मैं उनके बारे में सोच रही थी । अब वो अकेली रहती है ,बेटियों की शादी तो हो चुकी और बेटा है वो शहर में रहता है ,वह भी शादीशुदा है और बहुत बड़ा अफ़सर है । ऐसा नहीं है कि अपनी माँ को, शहर ले जाने के लिए उसने कभी कहा नहीं होगा और कहता भी होगा तो ,चाची कब जाने वाली थी ।  वह तो मरने तक यहाँ ही रहना चाहतीं थीं ।

             चाची के रिश्तेदार भी यही रहते थे ,पर आज कल रिश्ते पहले जैसे नहीं रहे । जैसे कच्चे धागों को टूटने में देर नहीं लगती , वैसे रिश्ते -नाते भी कच्चे ही हो चुके है ।बस पड़ोस में ही एक लड़का रहता था, जो अनाथ था ।चाची उसे माँ जैसा प्यार देती थी ,इसलिए वह भी चाची की बहुत इज़्ज़त करता था । बीमार होने पर दवाई भी लाकर देता था और ख़्याल भी रखता । चाची उसे अपने बेटा जैसा समझती थी ,हम सब चाची को “बिट्टू की  “चाची कहकर पुकारते थे ।     To be continued…….

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