वह जर्जर

 घने गहरे दरख्तों के बीच, उदास और मायूस ,

जर्जर हालत में सूखा हुआ, फिर भी खड़ा सीना ताने 

वृक्षों को फलों से लदा देख, गुमशुम  सा सोच रहा है ।

पंछियों की चहचहाहट भी वही हुआ करती है 

 जहाँ फलतीं शाखाओं  पर फूल पत्ते मुस्कुराते हैं 

नई नई आ रही पत्तियों को चुन चुन कर खाते हैं ,

आने जाने वाले भी रूक जाते, हरे-भरे वृक्ष को देख 

 थकावट उतारने के लिए वहीं बैठ कर सुस्ताते हैं ।


सूखते वृक्ष का फूल पत्तियां भी साथ छोड़ते जा रही 

बाजूओं सी टहनियाँ भी छिटक कर गिर गई 

झुक गया ‘कमर सा तना’ जिसके सहारे था खड़ा हुआ ,

सब देखकर हैरान नहीं है “जर्जर होता वृक्ष”

‘धैर्य रख कर’  होते जा रहे बदलाव को

 बिना दुःखी हुए सहन करता हुआ,

 प्रकृति के जीवन-मरण चक्रव्यूह को

  ‘ बस ‘     मौन होकर देख रहा है ।।

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