सजग पहरेदार
रात चाँदनी थी
तो ज़िक्र भी चाँद का ही रहा,
टिमटिमा रहे थे साथ में वो भी,
पर, उनका तो कहीं नहीं था ।
रोशन करते रहे जहां ,सारी-सारी रात,
सब खड़े रहे एक ही जगह और चॉंद घूमता ही रहा ,
चॉंद से भी सजग पहरेदार थे वो आसमान के
पर झोली भर , तारीफ़ें तो चाँद ही बटोरता रहा ।
भरी हुई थी थाली आसमाँ की, जगमगाते सितारों से
टूट रहा था फिर भी, मन्नत पूरी करता गया ज़माने की,
था चॉंद की ही पनाह में ही ,कर कुछ ना सका वह भी
नम हुईं पलकों से ,लाचार बेबस ,देखता ही रह गया ।
टूट जाने से एक तारें के
ख़ाली तो नहीं हुआ ,फिर भी आसमाँ
डटे हुए हैं साथी तारें अब भी वहीं पर,
रात के “सजग पहरेदार” है ये,
नहीं जायेगें यूँ ही छोड़कर ।।
Beautiful discription
ReplyDeleteBeautiful 🥰
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