शुक्रिया ख़ुदा

एक चारपाई,  जो दरख़्तों के नीचे थी लगायी

 ‘ईट पत्थरों की मुंडेर’ बनाकर  झोपड़ी भी बनायी,

चार लकड़ी खड़ी करके  था कपड़ा भी लगाया 

 पक्का काम करके, उसको ‘स्नानघर’ था बनाया ।


नहीं हुआ थोड़ा सा भी एहसास, हो सकता है ये भी 

उड़ गया सब   सामने ही आँखों के,

भरसे मेघा आँधी तूफ़ान के साथ   गरजते हुए

   रह गए सब देखते,  खड़े-खड़े ‘बदहवास’ होके ।


तैरती जा रही थी पानी में उनकी चारपाई 

उजड़ गई वो कुटिया, जो ‘महल जैसी थी बनायी

रह गई बस, एक ‘कपड़े टांगने वाली’ लंबी सी रस्सी

   जो थी एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक, खींच कर बंधी ।


 चल पड़े बचा-खुचा सम्मान उठाकर 

फिर से ढूँढने  एक अनजान डगर ,

अब भी हाथ जोड़ कर ,बोल रहे  “शुक्रिया खुदा” 

   कृपया आपकी, जान तो महफ़ूज़ है हम सबकी ।।

                          🙏🏼🙏🏼

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