ख़ुशियों की तिजोरी
किन शब्दों में पिरोऊँ
उनके छलकते जज़्बातों को ,
गोद में लेकर झूमते हुए, घुमते रहे दिन भर
छोटे छोटे हाथ, पलक झपकाती ‘गोल गोल आंखें,’
कर रही थी पहचान सबकी, हौले हौले मुस्कुराकर ।
बहुत तड़पे
फिर भी ना मिल पायी थी, ये ख़ुशी
चक्कर भी काटे, अनाथालय और मंदिरों के
‘तरस ही रहे थे’ इस ख़ुशी के लिए, एक लंबे अरसे से ।
फटेहाल चादर में, खिलती कली ‘कुम्हलाई सी’
कौन है किसकी ‘गोद से फिसल’ कर आई है
गोद किसकी सूनी हुई, किस मजबूरी में ठुकराईं है
तरस रही आँखों ने तो आगे बढ़कर, दिल से अपनाई है ।
रौशन करने आयी है उनके जीवन को
घर के कोने कोने को, जगमगा रही ‘बन के जुगनु’
‘दिये की रोशनी सी’ बनकर, घर-आंगन में आज,
“ख़ुशियों की तिजोरी” आई है ।।
Bhut sunder Kavita hai
ReplyDelete