रूकना नहीं अब

 शोर भी इतना, कि सहन न हो सके 

 पूरा दिन यूँ ही निकलता रहा उनके बीच में,

 ‘आस’ जो पूरी होने का ख़्वाब देखकर,रूके थे 

 हुईं झल्लाहट तो भी, ‘क़दम पीछे’ ना हट सके ।


 गहरे अंधेरे में, एक चमकती हुई रोशनी

 ‘बुनती ही चली’ गई थी ख्वाबों को,

पीछे-पीछे धीरे से, हिम्मत की चहल कदमी 

जगाती रही  हौसलों के उस ‘सोये शहर’ को ।


बिना जगाये,  नहीं जागना था ये

जगाना ही पड़ता  फिर भी झंकझोर कर

पल-पल पढ़ाया पाठ भी होकर मजबूर 

   ‘कुछेक दुखते क़िस्सो’ को कुरेदकर ।


सामने दिख रहा   शायद यही है छोर 

‘बित गई रात’  अब तो होने ही लगी भोर,

पकड़ कर उँगली,  सवेरा भी,

ले जाने आ रहा है मंज़िल की ओर ,

“रुकना नहीं अब” गलती से भी 

आलस छोड़, चलता जा बस

अपने निर्धारित लक्ष्य की ओर ।।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

दहलीज़

हैप्पी लास्ट दिन

घर के दरवाज़े