एक उपजती उम्मीद

                         दिन क्या हमेशा ऐसे ही चलते रहेंगे । “एक दर्द दूर नहीं होता कि दूसरा दर्द बाँह पकड़ लेता है”। सविता रात सोते-सोते यही सोच रही थी ।

      ब्याह से लेकर अब तक लगभग छब्बीस साल हो गए “लेकिन सुख का एक दिन भी  नहीं ” ।

                     बीच-बीच में कभी एक-आध बार कोई मौक़ा ऐसा आ जाता है जब लगता है कि सब  वाक़ई ठीक हो रहा हैं  ।

      लेकिन फिर  कुछ ऐसा हो जाता है “कि सब घूम फिर कर वहीं दिन , वैसा ही दुख दर्द” ।

                   कैसी अजीब-सी ज़िंदगी है जो पीछा ही नहीं छोड़ रही । “आँखों के कोने भीगकर कुर्ता भी गीला हो गया  सोचते सोचते” ।

      “तभी महसूस किया , जिससे कुर्ता गीला हुआ,यह तो नम आँखों का  पानी है”।

                      “बहुत बार सविता को यह भी लगता था कि वह अपनी बीमारी और लाचारी का ठीकरा अपने परिवार और समय पर फोड़ रही है” ।

      “जबकि वह कही न कही  ख़ुद भी ज़िम्मेदार है” ।

                        तभी उठकर फ़ोन में धीरे-धीरे भजन लगा लिए ।  “कुछ मूड भी ठीक होगा और नींद भी जल्दी आ जाएगी” ।

     “लेकिन आज तो भजनों के शब्द भी मन शांत नहीं कर रहे थे”। 

                    सविता ने ख़ुद को हिम्मत दी और उठकर बैठ गई । “बिस्तर  पर पड़े रहना अच्छा नहीं लग रहा था फिर कपड़े तह कर दिए” ।  

       सब्ज़ी काटनी शुरू कर दी । सुबह  उठकर बनानी जो थी  ।नरेश  भी काम पर जाएगा ।

       “ तभी नरेश ने टोका —सो जाओ , सुबह कर लेना । मेरी नींद ख़राब मत करो” । 

                     और बेटों ने भी बोलना शुरू कर दिया — “माँ अपना काम कल सुबह करना” ।  उनकी बात मानकर सब बंद कर दिया और चुपचाप फिर से बिस्तर पर लेट गई ।

                   “लेकिन उनमें से किसी ने भी नहीं पूछा - क्या दिक़्क़त है ? दर्द या कोई और समस्या ? कोई दवाई वग़ैरह ? “

       “  वह तो फिर से बिस्तर पर ही पड़ी थी ,दर्द को दबाती हुई” ।

       पिछले सप्ताह ही कमर का दर्द ठीक हुआ था ।  “आज फिर गर्दन जकड़ गई” ।

                      घर में  दाल -रोटी चल रही थी जैसे तैसे । “लड़के भी जवान हो गए लेकिन  काम-धंधा कोई नहीं” । अकेले नरेश ही कमा रहा था ।

     “सविता को यह कहते नहीं बनता था कि किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा लायें उसे” ।

        बस सबको काम बना दिखता । रोटी-सब्ज़ी दिखती । सोचते सब ठीक ही है ।

                           अब तो वह सोचने लगी थी कि पता नहीं कितने दिन की ज़िंदगी बची है “ऐसे ही सरक सरक कर काटनी पड़ेगी” ।

     सब के खाने-पीने का ध्यान रखती थी ।  “लेकिन ख़ुद की सेहत सब राम भरोसे “। 

          हर रोज़ यही सोचती —क्या पता उसकी तबियत भी पहले की तरह ठीक हो जाए ।

                  “ लेकिन आज सुबह उठते ही , पता नहीं कहाँ से हिम्मत आ गई” ।  

                  नहा-धोकर सारे काम निपटा लिए । नरेश भी काम पर चला गया । “उसके जाते ही अपना पर्स उठाया और घर से चल पडी” ।

                  “पड़ोसी के घर आई रोशनी दीदी ने कल ही बताया था” । चैरिटी हॉस्पिटल के बारे में । “वहाँ सबका  मुफ़्त में इलाज होता है” ।

        “वहाँ जब सब  ज़रूरतमंद जा सकते हैं तो वह क्यों नहीं जा सकती”। 

                        रो-रोकर नहीं सुनायेगी अब लोगों को ।” जो पीठ पीछे उस पर तरस खाकर बिचारी , मज़बूर और पता नहीं क्या- क्या बोलते होंगे” ।

     आज से उसका नया दिन, नया जीवन शुरू हो गया । जो उसकी अपनी इच्छा शक्ति की वजह से हुआ । 

                   अस्पताल में चेकअप के बाद पता चला —“ज़्यादा कुछ नहीं बस हड्डियाँ कमजोर हो गई” ।

      थोड़ा व्यायाम और दवाइयां और  खाना-पीना ठीक करना है ।

                     तीन-चार महीने तक सब ठीक हो जाएगा ।” वापिस घर तक आते आते ज़्यादातर तो हौसले से ही ठीक होती लग रही थी” ।

     

      “उस दीदी की बातें वाक़ई में जादू सा असर कर गई “।

                         जीवन को नए नज़रिए से देखने का प्रण कर लिया । “एक उपजती उम्मीद”   को कसके , थाम-कर मन में बसा लिया ।

      मुस्कुराते हुए घर का दरवाज़ा खोला और मन पसंद गाने फ़ोन में ही लगा कर चाय बनाने लगीं ।।


Comments

  1. Reality of all classes families
    Well written

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  2. Too good
    Based on originality of our lives

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  3. Very Good massage for society
    Nicely explained

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